सूरज की पहली किरण मेरे बंद आँखों को छुआ,
उसी समय ऊपर से पंच्चियों का गाना शुरू हुआ |
और मेरी आंखे धीमे-धीमे खुल गए,
सुबह की ठंडी हवा मेरे बदन को मस्त कर गए |
पाँव के नीचे पड़ीं गीली रेत मुझे प्रभावित कर गई |
एसा लग रहा था जेसे सारी उम्र मैं वहीँ खड़ा रहूँ,
और अल्लाह की इस श्रीश्त्ति को महसूस करता जाऊं |
फिजा से नाचते पेड़,
पौधे में खिलती कलियाँ,
पेड़ों से गिरते सूखे पते,
घांस पर सोते पानी के बूँद,
पंख फेलाए गगन में उडती चिड़ियाँ,
घुमती-खेलती रंगीन-मुर्गियां;
यह सब मेरे मन को ताज़ा कर गई |
मुझे इस नींद से जगति हुई,
शर्मीली सी एक नारी मेरे सामने से गुज़री |
सुबह-सुबह इस नारी की झलक,
मेरे दिन की शुरुवात में प्रोल्साहन भर देती है |
दिन बहुत बीत गए, साल आये और गए,
मेरी आंखे आज भी उसी नारी को ढूंढती है |
